राजस्थान में खत्म होते मिनरल उद्योग (Mineral Industry) को बचाने के लिए हजारों मजदूर और उद्याेगपति ब्यावर (Beawar) की सड़कों पर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे लेकिन चहुंओर चर्चा आशीष पाल पदावत (Ashish Pal Padawat) की हो रही थी. बीते करीब एक दशक से ब्यावर लघु उद्योग संघ अध्यक्ष पदावत ने लंबे समय से उद्योगों को बचाने का बीड़ा उठा रखा है. वे खत्म होते व्यापार को सुरक्षित रख हजारों मजदूरों को बेरोजगार होने से बचाने का प्रयास कर रहे हैं. अध्यक्ष होने के नाते आक्रोश रैली (Protest Rally) का नेतृत्व भी वही कर रहे थे. रैली में शामिल हजारों की तादाद में भीड़ देखने वाले लोग इसे पदावत का शक्ति प्रदर्शन बता रहे थे.
जगजाहिर है कि आशीष पदावत उद्योग संघ के साथ ही सियासत में भी काफी सक्रिय हैं. पैदाइश भी कांग्रेस समर्थक परिवार में हुई है और यही वजह है कि बचपन से सियासत को करीब से देख रहे हैं. उद्योग आंदोलन की तैयारियों के बीच शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि इतनी भीड़ जुटेगी और लोग इसे शक्ति प्रदर्शन मानकर चर्चा करेंगे.
गौरतलब है कि सियासत (Politics) में किसी भी नेता की ताकत का अंदाजा भीड़ से ही लगाया जाता है. यही वजह है कि समय-समय पर नेता अपनी जन-शक्ति दिखाने के लिए आलाकमान के सामने भीड़ जुटाते रहे हैं. हालांकि, सियासत में सक्रिय रहते हुए पदावत ने अभी तक ऐसा नहीं किया. या यूं कहें कि उन्हें ऐसा करने का कोई मौका नहीं मिला. गत विधानसभा चुनाव में टिकट के लिए पुरजोर प्रयास किए लेकिन शालीनता के साथ. बस यही वजह रही कि उद्योग आंदोलन में पदावत के शक्ति प्रदर्शन की कई जगह चर्चा हुई.
कलेक्ट्रेट परिसर में बाजार के एक बड़े व्यापारी ने कहा, "मैं मोदी का समर्थन करता हूं लेकिन यदि पदावतजी को कांग्रेस का टिकट मिलता तो उनका साथ देता. मैं चाहता हूं कि कांग्रेस के दूसरे नेताओं को अब इनका साथ देना चाहिए ताकि ब्यावर का भविष्य सुधरे." एक भाजपा (BJP) समर्थक व्यापारी का कांग्रेस (Congress) नेता के प्रति ऐसा विचार बताता है कि चुनाव के वक्त पार्टी से ज्यादा जरूरी व्यक्ति होता है, और होना भी यही चाहिए.
एक सरकारी कार्मिक बोले, "आशीषजी निर्विवाद छवि वाले नेता हैं. किसी से कोई बैर नहीं रखते. सभी को साथ लेकर चलते हैं. रैली में भी कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के नेता इनके साथ चल रहे थे. अगर यह चुनाव लड़े तो हर वर्ग इनका साथ देगा." इस बात पर वहां मौजूद एक समाज प्रमुख ने चुटकी लेते हुए यह भी कह दिया कि "जो पिछले चुनाव में टिकट मांगकर शहर की सत्ता पर राज करने का सपना देख रहे थे वे इन दिनों कार्यकर्ता बनकर दूसरे नेताजी के पीछे घूम रहे हैं."
बहरहाल, विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है लेकिन आने वाले निकाय चुनाव की घोषणा से पहले सियासी सरगर्मियां सर्दी में भी सन्नाटा चीर रही हैं. ©सुमित सारस्वत





