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September 28, 2024

कृष्ण नगरी में मिल गई गीता !, जानें क्या थी घर छोड़कर वृंदावन जाने की वजह - Laapataa Ladies Found

✍🏻 सुमित सारस्वत

इन दिनों फेमस हिंदी फिल्म 'लापता लेडीज' की चर्चाओं के बीच कल शनिवार सुबह ब्यावर (Beawar) से लापता हुई गीता चौहान का पता लग गया है. परिजन का कहना है कि, गीता ने आज रविवार सुबह अपनी बेटी रानू को कॉल कर खुद के वृंदावन (Vrindavan) में सुरक्षित होने की बात कही है. उन्होंने बेटी से कहा कि 'परेशान मत होना, मैं कल घर लौट आऊंगी.'

शुक्र है कि गीता (Geeta) सुरक्षित हैं लेकिन उनके इस तरह बिना बताए चले जाने से पूरे शहर के साथ उनके परिजनों और रिश्तेदारों को काफी परेशानी हुई. सभी ने अपने-अपने वाहनों और साधनों की सहायता से उन्हें कई शहरों में तलाश किया. ब्यावर के लगभग हर व्हाट्सएप ग्रुप में कल कई कई बार उनकी तस्वीरें वायरल कर लोगों ने उनका पता लगाने का प्रयास किया.

यह सभी को पता है कि गीता भक्ति भाव से जुड़ी हैं. अगर उन्हें कहीं जाना ही था तो परिवार को बताकर चले जाते, लेकिन मानसिक तनाव में मनुष्य ऐसा नहीं सोचता. गीता की व्यक्तिगत पहचान के कारण उनका यह मामला पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गया, इसलिए यह जानना जरूरी है कि भजन-कीर्तन करने वाली गीता को आखिर किस बात का तनाव हो गया? इस सवाल के जवाब में परिजन ने बताया कि कुछ समय से उनकी बेटी के वैवाहिक रिश्ते की बात चल रही है. परिवार को मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) का एक लड़का पसंद आया लेकिन गीता अपनी लाड़ली को इतना दूर नहीं भेजना चाहती. बस, इतनी सी बात पर परिवार में सहमति नहीं बनी और बेटी के दूर चले जाने की सोच से गीता कुछ दिन से तनाव में थी. हालांकि अभी बेटी का रिश्ता तय नहीं हुआ था. लेकिन यह तय है कि इस घटना से सबक लेकर परिवार अब गीता के विचारों का आदर करते हुए सर्व सहमति से ही कोई फैसला करेगा.

वर्तमान वक्त में लगभग हर घर में किसी न किसी बात का तनाव है. कहीं स्वास्थ्य को लेकर, तो कहीं व्यापार में मंदी. कहीं पति-पत्नी में अनबन, तो कहीं बच्चों की हरकतों से परेशानी. कहीं कर्ज से तनाव, तो कहीं जॉबलेस होने की चिंता. ऐसे नकारात्मक माहौल में भी मनुष्य को सकारात्मक रहने की बेहद आवश्यकता है. सभी को पता है कि कोरोना काल (Corona Pandemic) के बाद इम्युनिटी सिस्टम कमजोर हो गया है. आए दिन हार्ट अटैक के मामले सामने आ रहे हैं. जरूरी है कि घर-परिवार को तनावमुक्त रखें. खुश रहें और प्रत्येक व्यक्ति की खुशी का ख्याल रखें. -सुमित सारस्वत, मो.9462737273

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August 26, 2019

अमिताभ बच्चन की तरह आप भी रो पड़ेंगे यह कहानी पढ़कर - Emotional Story of Noopur Chauhan


'कौन बनेगा करोड़पति' रियलिटी शो के बीते 11 साल के इतिहास में नूपुर चौहान वाला दो दिवसीय एपिसोड शायद सबसे भावुकता भरा रहा। नूपुर को देखकर और उनकी बातें सुनकर दिल भर आया। दोनों दिन आंखें नम रही। मेरी ही नहीं, शायद ये एपिसोड देख रहे हर दर्शक की आंख नम हुई होगी। शो के होस्ट अमिताभ बच्चन जी और मेरे साथ टीवी देख रहे मेरे माता-पिता भी भावुक थे। मैं समझता हूं कि इस दिव्यांग बहन की कहानी दुनिया की हर प्रेरणादायी कहानी से ऊपर है।


केबीसी 11 के फास्टर फिंगर फर्स्ट में जब नुपूर के प्रथम आने की घोषणा हुई तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ऑडियंस खड़ी हो गई मगर जीतने वाली 29 वर्षीय नुपूर अपनी सीट पर ही बैठी रही। क्योंकि वो सामान्य नहीं, दिव्यांग है। ठीक से चल नहीं पाती मगर उनका दिमाग सामान्य है। जीत की घोषणा होते ही वो खुशी से रोने लगी। अन्य महिला प्रतिभागियों के शामिल होने के बावजूद महिलाओं से जुडे़ सवाल का जवाब एकमात्र नुपूर ने ही दिया। शो हॉस्ट कर रहे अमिताभ बच्चन जी उनके पास गए और हाथ आगे बढ़ाकर उन्हें सीट से उठाया। नुपूर लड़खड़ाने लगी तो भाई ने पास आकर गोद में उठाया और हॉट सीट पर बैठाया। नुपूर की कहानी सुन बच्चन जी की आंख से आंसू छलक पड़े। ऑडियंस भी रोने लगी।


भावुकता भरे शो में बिग बी ने नुपूर से बातचीत की तो उन्होंने अपनी जिंदगी के कई अनुभव साझा किए। उनसे पूछा गया कि आप व्हीलचेयर पर क्यों नहीं बैठती? उनका जवाब था, 'अगर मैं व्हीलचेयर पर बैठ जाती तो शायद खुद कभी खड़े नहीं हो पाती।' हौसलों की उड़ाने भरते हुए आज वो बतौर टीचर आत्मनिर्भर हैं। बच्चों को पढ़ाती हैं और उससे करीब पांच हजार रुपए प्रतिमाह आमदनी होती है।


नुपूर जो ठान लेती हैं उसे पूरा करके दिखाती हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है केबीसी। वो हॉट सीट तक आने के लिए कई सालों से प्रयास कर रहीं थी। पूर्व में तीन बार फास्टर फिंगर फर्स्ट खेलकर बाहर होने के बाद भी उन्होंने चौथी बार लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास किया। इस उम्मीद के साथ कि इस बार हॉट सीट तक अवश्य पहुंच जाऊंगी। वो पहुंची और बड़ी समझदारी से खेलते हुए 12 लाख 50 हजार रुपए जीते।


नुपूर ने बताया कि उनको समझने, हिम्मत देने और निखारने में उनकी टीचर तनु जी का खास योगदान रहा। उन्होंने हर कदम पर विश्वास दिलाया और कभी हिम्मत नहीं हारने दी। बेशक तनु जी ने इस प्रतिभा को निखारकर शिक्षा जगत के लिए मिसाल कायम की है।


यह भी पढ़ें- भगवान तू जालिम क्यों बन गया

दरअसल नुपूर की यह हालत जन्म के वक्त एक चिकित्सक की लापरवाही के कारण हुई। उन्होंने बताया कि 'मेरा जन्म सीजेरियन हुआ था। उस वक्त सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट लग गए। जन्म होते ही रोई नहीं तो डॉक्टर ने मृत बताकर डस्टबिन में फेंक दिया था। नानी और मौसी ने कर्मचारियों को पैसे देकर मुझे डस्टबिन से बाहर निकलवाया। नानी ने बड़ी मिन्नतें करते हुए डॉक्टर से कहा कि इसे थपथपाकर देखो, शायद जिंदा हो जाए। ऐसा करते ही मैं रोने लगी। उस वक्त डॉक्टर ने मुझे गलत इंजेक्शन लगा दिए थे जिससे मैं कभी नॉर्मल नहीं जी सकी।' नुपूर ने डॉक्टरों से निवेदन किया है कि वो अपनी जिम्मेदारी समझें ताकि ऐसा किसी और के साथ ना हो।


सकारात्मक सोच रखने वाली नुपूर प्रेरणा हैं उन लोगों के लिए जो सक्षम होते हुए भी कहते हैं कि हम कुछ कर नहीं सकते। इस बहन ने साबित कर दिया कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। Amitabh Bachchan जी और Kaun Banega Crorepati टीम को धन्यवाद जिन्होंने Noopur Chauhan जैसी गुमनाम प्रतिभाओं को उत्कृष्ट मंच दिया।


Salute #Noopor गर्व है आप पर


सादर शुभकामनाएं..
✍️ सुमित सारस्वत

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May 25, 2019

पश्चाताप | Pashchatap

कहा जाता है जो आप कर्म करते हैं उसका फल कभी न कभी आपको मिल ही जाता है। ऐसा ही मेरे साथ हुआ।

बात उन दिनों की है जब मैंने कॉलेज में दाखिला लिया था। उसी वक्त एक अन्य लड़की ने भी दाखिला लिया था। उसकी सुन्दरता ने मेरे मन के भीतर जगह बना ली थी। मेघा नाम था उसका। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती हुई और देखते ही देखते वो दोस्ती प्रेम में तब्दील हो गई। इस साथ से पता ही नहीं चला कब हमारी ग्रेजुएशन हो गई। हम हमारे रिश्ते को आगे बढ़ाना चाहते थे। हमने हमारे घर वालों को सब बता दिया और हमारी शादी तय हो गई। इस दौरान मेरी नौकरी भी लग गई और मुझे काम के सिलसिले से बाहर जाना पड़ा।

समय कैसे करवट लेता है किसी को नहीं पता। मेघा ने भी स्कूल ज्वाॅइन कर लिया था। एक दिन वो स्कूल से लाैट रही थी कि किसी ने उसका अपहरण कर लिया और उसे अपनी हवस का शिकार बना लिया। शादी के सिर्फ बीस दिन बचे थे। मेरे मन को अब मेघा से शादी करना गवारा नहीं लगा। मुझे लगा अब वो अपवित्र हो गई है। शायद यह मेरी छोटी सोच थी। पर उस समय मुझे उसका एहसास नहीं हुआ। मैं किसी दूसरी लड़की से शादी करके जीवन में आगे बढ़ गया। मेरे घर बेटी ने जन्म लिया। बेटी की किलकारियों ने पता ही नहीं चलने दिया कि वो कब बड़ी हो गई। अब उसकी शादी की बात चलने लग गई। उसको उसी के कॉलेज का दोस्त साहिल पसंद था। उसने हमें बताया और हमने दोनों की शादी तय कर दी। शादी की तैयारियां काफी धूमधाम से चल रही थी और आखिर में विवाह का वो दिन आ गया जिसका हमें बहुत इंतजार था।

 
बेटी तैयार होने के लिए पार्लर गई। वापस लौटते समय उसकी कार को आवारा लड़कों ने घेर लिया। ड्राइवर को मारकर कोने में पटक दिया और मेरी बेटी के साथ दुष्कर्म किया। जब मुझे यह खबर मिली तो मानो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। अब मुझे मेरी बेटी में वही तीस साल पहले वाली मेघा दिखाई दे रही थी। मुझे लगा साहिल इसको अब स्वीकार नहीं करेगा। पर साहिल की सोच ने मुझे अपने आप को सोचने पर मजबूर कर दिया। उस वक्त उसने मेरी बेटी को मानसिक मजबूत किया जो हम नहीं कर पाते। उन बदमाशों को सजा भी दिलवाई। कुछ दिनों बाद उससे शादी करके उसे उस हादसे को पूरी तरह से भुलाने में मदद की। साहिल ने मुझे कहा, 'मैंने आपकी बेटी को उसकी शारीरिक सुंदरता से नहीं, उसकी आंतरिक सुंदरता से प्रेम किया है।' उसकी बातों ने मेरे मन को छू लिया। अब मुझे अपने आप पर शर्मिन्दगी हो रही थी। यह सोचकर कि जब मेघा को उस समय सबसे अधिक मेरे सहारे की जरूरत थी तब मैंने अपनी दकियानूसी सोच के कारण उसका साथ नहीं दिया।

आज साहिल मुझे अपने आप से बहुत बड़ा दिख रहा था। शायद कोई फरिश्ता, जिसने मुझे ये समझा दिया कि दुष्कर्म करने वालों को दंड मिलना चाहिए, पीड़िता को नहीं। उसके शरीर से ज्यादा हम समाज वाले उसका मानसिक बलात्कार कर देते हैं।

यह भी पढ़ें : मेरे दिल का दर्द

अब मैंने सबसे पहले मेघा को ढूंढने की कोशिश की। कुछ दिनों में उसका पता लग गया। वो अपने जीवन में आगे बढ़ चुकी थी। उसने शादी नहीं की। दुष्कर्म पीड़िताओं के साथ लड़कर उन्हें न्याय दिलाना अपना लक्ष्य बना लिया। मिलते ही मैंने उससे माफी मांगी। उसका दिल बहुत बड़ा निकला। उसने मुझे माफ किया। मैंने भी उसके मिशन को अपना मिशन बनाकर अपनी गलती का पश्चाताप किया।

-लेखिका मीनाक्षी भारद्वाज ज्वलंत व सामाजिक विषयों पर लिखती हैं।

उक्त कहानी पर आप अपने विचार कमेंट बॉक्स में अवश्य लिखें।
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November 11, 2018

पहली बार बहू ने सास की अर्थी को दिया कंधा | Emotional Story of Relationship

  • पोतियों ने दादी की चिता को दी मुखाग्नि
  • समाज में कायम की नई मिसाल

पुरातन काल से चली आ रही सामाजिक रूढ़ियों और मिथक को तोड़ते हुए अपनी सास की आखिरी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए राजस्थान के ब्यावर की एक बहू ने सास की अर्थी को कंधा देकर समाज के लिए नई मिसाल पेश की। मुक्तिधाम में दो पोतियों ने दादी की चिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की रस्में निभाई। संभवत: यह देश का पहला उदाहरण है जब मुक्तिधाम में महिलाओं ने महिला का पूर्ण अंतिम संस्कार किया है।


जानकारी के मुताबिक ब्यावर में रहने वाली राजपूत समाज की 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला नीलम भाटी का शनिवार देर रात निधन हो गया। परिवार में कोई पुरुष नहीं होने पर बहू यल्पना ने सास की अर्थी को कंधा दिया। मां को देखकर प्रांजल व प्रियांशी ने भी अपनी दादी के अंतिम संस्कार की रस्में निभाई। पोतियों ने दादी की अर्थी को कंधा और मुक्तिधाम में चिता को मुखाग्नि भी दी। सास को कंधा देने वाली बहू यल्पना भाटी का कहना है कि मेरी सास ने मुझे बेटी की तरह रखा। मैंने अपनी मां समान सास की अंतिम इच्छा का सम्मान किया है।


दरअसल विवाह के कुछ समय बाद ही नीलम के पति भैरूसिंह भाटी का निधन हो गया था। इकलौते पुत्र गजेंद्र सिंह भी 15 साल पहले चल बसे। ऐसे में सास-बहू अपनी दो बेटी-पोतियों के साथ रहती थी। मां-बेटियों के इस कदम ने समाज में सास-बहू के रिश्ते की नई मिसाल कायम की है। -सुमित सारस्वत, सामाजिक चिंतक, मो.09462737273

Sumit Saraswat available on :
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February 18, 2018

दिल का दर्द : भगवान तू जालिम क्यों बन गया! | Human Story

✍ Sumit Saraswat 'SP'
हेमंत और रितु ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी शादी ऐसे गमगीन माहौल में होगी। उन्होंने क्या, किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि कोई शादी ऐसी दर्दनाक भी होगी। जहां खुशियों की शहनाई बजनी थी वहां मातमी सन्नाटा पसरा था। जीवनसाथी के साथ जन्मों का रिश्ता जोड़ने के लिए अग्नि के सात फेरे लेते वक्त उत्साह की बजाय उदास हेमंत के पैर लड़खड़ा रहे थे। मांग भरते वक्त हाथ कांप रहे थे। मुस्कुराने की बजाय रितु रो रही थी। यह पता लगने पर आज मैं रो रहा हूं। जब से इनके विवाह की तस्वीरें देखी और जानकारी हुई तब से हृदय विचलित है। रोंगटे खड़े हो गए। दिल भर आया। नम आंखों से उस भगवान को कोसने के लिए यह लिख रहा हूं जिसकी जिम्मेदारी थी इस विवाह को आनंदमय बनाने की। यह शिकायत सिर्फ और सिर्फ उस दिव्यात्मा के लिए है जिसे हम परमात्मा कहते हैं। जिससे उम्मीद करते हैं कि हमारे संकट में वो काम आएगा।


अरे निर्दयी, हमने सोचा नहीं था कि तू खुशियों के बीच ऐसा दर्द देगा। इतना नाराज क्यों हो गया, अगर वो परिवार गजानंद को मनाना भूल गया। क्या हो गया अगर हलवाई ने चूल्हा जलाने से पहले अग्नि को भोग नहीं लगाया। क्या फर्क पड़ गया तूझे अगर मायरा रस्म से पहले तेरे लिए कपड़े नहीं निकाले। 
जालिम न जाने कौनसी बात तुझे अखर गई कि तूने रक्षाबंधन पर सुख और सुरक्षा के वादे करने वाले भाई-बहनों को भी नहीं बख्शा। दोनों भाई अपने भांजे की शादी में बहन को चुनरी ओढ़ाने आए थे। उन्होंने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी कि मायरे में जो चुनरी वो बहन को ओढ़ा रहे हैं वो कफन बन जाएगी। बहन की मौत के बाद भाई पीहर की चुनर ओढ़ाते हैं तूने तो जीते जी आखिरी चुनरी ओढ़वा दी। बेशर्म थोड़ी तो शर्म करता।
कहर बरपाने से पहले एक पल सोच तो लेता कि क्या बीतेगी इस परिवार पर। शेरवानी पहनकर शादी करने वाले दूल्हे ने आंखों में आंसू लेकर सामान्य शर्ट और जींस में नंगे पैर शादी की। घोड़ी पर सवार होकर शादी के लिए आने वाले शहजादे को देखने का सपना संजोए दुल्हन की दिली ख्वाहिश धमाके में धूमिल हो गई। यह नवविवाहित जोड़ा अपनी शादी में हुआ मौत का मंजर कभी भुला नहीं पाएगा। जो मां निकासी के वक्त घोड़े पर बैठे बेटे की बलाइयां लेती उसी मां की अर्थी को बेटा कंधों पर लेकर श्मशान जाएगा। जब भी इस जोड़े की वैवाहिक वर्षगांठ होगी तब यह खुशियां नहीं मनाएगा बल्कि इस हादसे को याद करते हुए कांपेगा।
ध्यान है हमें कि कलयुग चल रहा है और तेरी ऐसी हरकतों से ही तो लोगों को कलयुग का एहसास होगा। बड़ा शातिर है रे तू। हलवाई को मौत का माध्यम बनाकर बदनाम कर दिया। उन नेताओं को नजरअंदाज कर दिया जिन्होंने आबादी क्षेत्र में ऐसी व्यावसायिक गतिविधियों को अनदेखा किया। समाज सेवा के नाम पर चांदी कूटने वालों को चर्चा में ही नहीं आने दिया। उन अधिकारियों को भी चतुराई से बचा लिया जिनकी जिम्मेदारी है इन घटनाओं को रोकना। और तो और घटना के बाद अगर मलबे में दबा कोई जीव जिंदा हो तो उसे बचा न सकें इसलिए संसाधन भी उपलब्ध नहीं होने दिए। खाली हाथ भेज दिया बचाने वालों को। क्या गजब खेल रचाया! तालियां बजानी चाहिए तेरे इस खेल पर। लेकिन नहीं बजा पा रहे। रो रहे हैं उन लाशों को देखकर जो एक के बाद एक मलबे से निकलती जा रही है। कल जब एक मजदूर हाथों में मासूम से बच्चे की लाश उठाकर लाया तब सभी देखने वाले भावुक हो गए। छोटे-छोटे हाथों से उसकी मासूमियत को महसूस कर लिया। हम लोग कहते हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं, तू उनको तो बख्श देता पापी। सुन, अगर इस तरह की मौत देने के लिए धरती पर भेजा है ना, तो नहीं चाहिए ऐसी जिंदगी। अगर तेरे पास कमी पड़ गई थी और मौत देकर इंसानों को बुलाना था तो कोई और जरिया अपना लेता। शादी में आकर जो तांड़व किया, वो अच्छा नहीं।
पता है उस क्षेत्र में कई मकान क्षतिग्रस्त हो गए। उन घरों में रहने वाले परिवार इधर-उधर छुपे हैं। भोजन-पानी भी मुश्किल से नसीब हो रहा है। अंधेरे में रातें गुजारनी पड़ रही है। बुजुर्गों का तो दम भरने लगा है। कुछ तो सांसों को सुचारू रखने के लिए अस्पताल पहुंच गए हैं। कई लोग अपनों की आस लगाए तलाश में भटक रहे हैं। कितने और शव मलबे में दबे हैं किसी को खबर नहीं। शादी वाले घरों में मातम छाया हुआ है। जो खिलखिलाते चेहरे शादी के एलबम में आने थे उनकी तस्वीरें अब माला के साथ दीवारों पर टंग गई है। पूरा प्रदेश हिल गया तेरी इस हरकत से। ब्यावर, अजमेर, जोधपुर, पीपाड़ सिटी में तो हर शख्स की जुबां पर सिर्फ इसी घटना की चर्चा है। चुनावी साल में नेताओं को राजनीतिक मसाला भी मिल गया। वो मौत के मुआवजे पर चटकारे ले रहे हैं। मृतकों और घायलों के परिवार का क्या हाल है, किसी को मतलब नहीं। खैर, तूझे क्यों पता होगा। तू तो तमाशबीन बना ऊपर से देख रहा होगा उन लोगों की तरह जो मौके पर मातमी मंजर को मनोरंजन समझकर देखने उमड़े हैं। -सुमित सारस्वत, सामाजिक चिंतक, मो.09462737273

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July 23, 2017

हाइवे पर हादसे में बिखर गया पिता-पुत्र का सपना | Emotional Story of A Police Officer

एक पिता जिसने जीवनभर संघर्ष किया। 57 बरस की उम्र में उसके जीवन में खुशियां आई। पुत्र का चयन राजस्थान प्रशासनिक सेवा में हुआ। पूरे परिवार में खुशी का माहौल था। पिता खुद गर्व से फूला नहीं समा रहा था। अपने पुत्र और दोस्तों को लेकर वह अपने उसी सपने को पूरा करने के लिए आखिरी मंजिल की ओर बढ़ रहा था कि हाइवे पर एक हादसे में उसका सपना बिखर गया। कार में सवार पिता और पुत्र के साथ दो अन्य भी काल का ग्रास बन गए।
हम बात कर रहे हैं रामसिंह जाट की, जो जोधपुर पुलिस कमिश्नरेट में इंस्पेक्टर थे। रविवार की सुबह अपने पुत्र जयप्रकाश, एसएलबीएस कॉलेज के मालिक जितेन्द्र गोदारा व एक अन्य साथी भरत के साथ जयपुर जा रहे थे। रास्ते में पाली जिले के रायपुर थाना क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग पर बर और झाला की चौकी के बीच अचानक मौत ने दस्तक दी और उनकी गाड़ी अनियंत्रित होकर पास ही बने डिवाइडर से टकराने के बाद ट्रोले से टकरा कर बिखर गई। साथ ही बिखर गया पिता और पुत्र का वह सपना जो कि उन्हें सफलता की ओर ले जा रहा था। दर्दनाक हादसे के बाद एक-एक कर चार जिंदगियों ने दम तोड़ दिया।
घटना के बाद पिता-पुत्र के पैतृक गांव सोजत के निकट राजोला कलां के भाणिया में शोक छा गया। जिसने भी हादसे की खबर सुनी, वो घटनास्थल की ओर दौड़ पड़ा। परिजन भी बदहवास स्थिति में मौका स्थल पहुंचे। 40 से अधिक पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए। घटनास्थल पर खौफनाक मंजर देखकर हर तरफ रुदन और शोक था।
संघर्ष से गुजरा जीवन
मृतक इंस्पेक्टर 57 वर्ष के थे। वे भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद पुलिस में भर्ती हुए थे। 1997 में पुलिस में भर्ती होने के बाद पहले उप निरीक्षक और फिर मेहनत कर निरीक्षक के पद तक पहुंचे। इस दौरान उनका जीवन काफी संघर्ष से गुजरा। इसी बीच जब पुत्र का आरएएस में चयन हुआ तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें लगा मानो बरसों की तपस्या पूरी हुई, लेकिन नियती को कुछ और ही मंजूर था। -राजस्थान से सुमित सारस्वत की रिपोर्ट।

देखिए : खौफनाक हादसे की दर्दनाक तस्वीरें

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